कैसे अहंकार मौत का कारण बना जानिए ....
....और मूर्तिकार एक गलती कर बैठा
एक गांव में एक मूर्तिकार रहता था। उसकी बनाई मूर्तियों को देखकर हर किसी को उनके जीवंत होने का भ्रम हो जाता था। उस मूर्तिकार को अपनी कला पर बड़ा घमंड था। जीवन के सफर में एक वक्त ऐसा भी आया, जब उसे लगने लगा कि अब वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पायेगा। यह सोचकर वह परेशानी में पड़ गया। यमदूतों को भ्रमित करने के लिए उसने एक योजना बनाई। उसने हूबहू अपने जैसी दस मूर्तियां बनाई और खुद उन मूर्तियों के बीच जाकर बैठ गया। यमदूत जब उसे लेने आये, तो एक जैसी ग्यारह आकृतियों को देखकर दंग रह गए। वे पहचान नहीं कर पा रहे थे कि उन मूर्तियों में से असली मनुष्य कौन है? वे सोचने लगे कि अब क्या किया जाए? यदि मूर्तिकार के प्राण नहीं ले सकें, तो सृष्टि का नियम टूट जायेगा और सत्य परखने के लिए मूर्तियों को तोड़ा, तो कला का अपमान होगा। अचानक एक यमदूत को मानव स्वभाव के सबसे बड़े दुर्गुण अंहकार को परखने का विचार आया। उसने मूर्तियों को देखते हुए कहा, "कितनी सुन्दर मूर्तियाँ हैं, लेकिन इन मूर्तियों में एक गलती है। काश ! मूर्ति बनाने वाला मेरे सामने होता, तो मैं उसे बताता कि मूर्ति बनाने में क्या गलती हुई है।" यह सुनकर मूर्ति का अंहकार जाग उठा। उसने सोचा, "मैंने अपना समस्त जीवन मूर्तियाँ बनाने में समर्पित कर दिया, भला मेरी मूर्तियों में क्या गलती हो सकती है?" वह बोल उठा, "कैसी गलती?" झट से यमदूतों ने उसे पकड़ लिया और कहा, "बस यही गलती कर गए तुम अपने अहंकार में, क्योंकि बेजान मूर्तियां बोला नहीं करती है।" इतिहास गवाह है, अहंकार ने हमेशा इंसान को दुःख के सिवा कुछ नहीं दिया है।
तो दोस्तों मैं उम्मीद करता हूँ मेरी कहानी आपको पसंद आयी होगी। आप इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें। अगर आप ऐसी ही कहानी, लेटेस्ट न्यूज़, और इंटरनेट से संबंधित जानकारी चाहते है, तो आप हमारे वेबसाइट के बेल आइकॉन को दबा दें। जिससे आपको नोटिफिकेशन तुरंत मिल जाएगी।
....और मूर्तिकार एक गलती कर बैठा
एक गांव में एक मूर्तिकार रहता था। उसकी बनाई मूर्तियों को देखकर हर किसी को उनके जीवंत होने का भ्रम हो जाता था। उस मूर्तिकार को अपनी कला पर बड़ा घमंड था। जीवन के सफर में एक वक्त ऐसा भी आया, जब उसे लगने लगा कि अब वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पायेगा। यह सोचकर वह परेशानी में पड़ गया। यमदूतों को भ्रमित करने के लिए उसने एक योजना बनाई। उसने हूबहू अपने जैसी दस मूर्तियां बनाई और खुद उन मूर्तियों के बीच जाकर बैठ गया। यमदूत जब उसे लेने आये, तो एक जैसी ग्यारह आकृतियों को देखकर दंग रह गए। वे पहचान नहीं कर पा रहे थे कि उन मूर्तियों में से असली मनुष्य कौन है? वे सोचने लगे कि अब क्या किया जाए? यदि मूर्तिकार के प्राण नहीं ले सकें, तो सृष्टि का नियम टूट जायेगा और सत्य परखने के लिए मूर्तियों को तोड़ा, तो कला का अपमान होगा। अचानक एक यमदूत को मानव स्वभाव के सबसे बड़े दुर्गुण अंहकार को परखने का विचार आया। उसने मूर्तियों को देखते हुए कहा, "कितनी सुन्दर मूर्तियाँ हैं, लेकिन इन मूर्तियों में एक गलती है। काश ! मूर्ति बनाने वाला मेरे सामने होता, तो मैं उसे बताता कि मूर्ति बनाने में क्या गलती हुई है।" यह सुनकर मूर्ति का अंहकार जाग उठा। उसने सोचा, "मैंने अपना समस्त जीवन मूर्तियाँ बनाने में समर्पित कर दिया, भला मेरी मूर्तियों में क्या गलती हो सकती है?" वह बोल उठा, "कैसी गलती?" झट से यमदूतों ने उसे पकड़ लिया और कहा, "बस यही गलती कर गए तुम अपने अहंकार में, क्योंकि बेजान मूर्तियां बोला नहीं करती है।" इतिहास गवाह है, अहंकार ने हमेशा इंसान को दुःख के सिवा कुछ नहीं दिया है।
तो दोस्तों मैं उम्मीद करता हूँ मेरी कहानी आपको पसंद आयी होगी। आप इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें। अगर आप ऐसी ही कहानी, लेटेस्ट न्यूज़, और इंटरनेट से संबंधित जानकारी चाहते है, तो आप हमारे वेबसाइट के बेल आइकॉन को दबा दें। जिससे आपको नोटिफिकेशन तुरंत मिल जाएगी।
0 comment:
Post a Comment